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मन की भड़ास

  मन की भड़ास : ************* अमूमन मन की भड़ास निकालने को गलत माना जाता है। क्योंकि हमारे बड़े बुजुर्गों ने हमेशा से हमें यही सीखाया है कि अगर कोई कुछ कहे और अपने को अच्छा न लगे तो चुप हो जाओ पर प्रतिउत्तर मत दो। बस यही बात समझकर हम अक्सर मौके पर कुछ नहीं कहते और बाद में ये सोच कर घुटते है कि काश उस समय जवाब तो दिया होता।  हालिया कुछ व्यज्ञानिक रिसर्च ये कहते हैं कि कुछ बुरा लगने पर हाल के हाल प्रतिउत्तर दे देने से खुद को सम्भलने का मौका तुरंत मिल जाता है। ये अपनी खुद की मानसिक सेहत के लिए भी जरूरी है। मानते है कि दूसरे को भला बुरा कहना गलत होता है। पर अपने मत की भिन्नता को तुरंत सामने रखना बाद में होने वाली ग्लानि के लिए अच्छा होता है। बाद में हम खुद को कोसने लगते है कि उस समय क्यों नहीं बोला जब बोला जाना जरूरी था।  मन की भड़ास निकालना जरूरी है इसे कुछ बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है।  ★ भावनाओं के नियंत्रण में सहायता : अक्सर झुंझलाहट मन को शांत कर देती है। ट्रैफिक में जाम में अगर फंसे हो तो अपने आप मन में झुंझलाहट पैदा होती है। पर ये उस समय की त्वरित भावनाओं की प्रतीक ...

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