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होली की रंगत में स्त्री की सुसंगत

  होली की रंगत में स्त्री की सुसंगत : ••••••••••••••••••••••••••••••• अभी अभी हमारे यहां होली का त्यौहार मनाया गया। जो फाल्गुन माह में आता है। रंग, मिठाईयां और मेल मिलाप से भरपूर ये पर्व खुशियों से भरा होता है। लेकिन किसी भी त्यौहार को ख़ुशनुमा बनाना उस घर की स्त्री से ही होता है।  स्त्री से ही त्यौहारों की रंगत और लज्ज़त है।  होली के रंग केवल गुलाल और पानी से नहीं बनते, बल्कि उन रंगों में घर की स्त्री का स्नेह घुला होता है। वही स्त्री है जो किसी भी त्योहार को सचमुच त्योहार बनाती है। यदि घर में स्त्री की उपस्थिति न हो तो त्योहार का उत्साह भी जैसे अधूरा सा रह जाता है। होली का पर्व भी इसी सच्चाई का सुंदर उदाहरण है, क्योंकि इसकी तैयारी से लेकर उसके उल्लास तक हर रंग में एक स्त्री की मेहनत और प्रेम छिपा होता है। होली आने से कई दिन पहले ही घर की स्त्री के मन में एक अलग हलचल शुरू हो जाती है। वह घर की सफाई करती है, पुराने कोनों को सजाती है और पूरे घर को इस तरह संवारती है जैसे कोई नई खुशी आने वाली हो। रसोई में गुझिया, मठरी, शक्करपारे , दही बड़े और तरह-तरह के पकवानों की खुशबू फैल जात...

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