सबक
सबक : •••••••••• यूँ तो हम सभी अपनी अपनी दुनिया में इतने व्यस्त से हो गए कि अब अपनों के लिए ही समय कम निकल पाता है। पर क्या ये कभी सोचा है कि उन अपनों के लिए हमारी आवाज़ की एक तरंग ही काफी होती है आत्मीयता दर्शाने के लिए....इसी भाव को व्यक्त करती एक डिलीवरी बॉय की छोटी सी कहानी। जिसने डिलीवरी करते करते रिश्तों का बेहतरीन सबक सीखा......!! ◆ सबक : वह ज़्यादातर शाम की शिफ्ट करता था। उस दिन रात करीब 9 बजे उसने आख़िरी ऑर्डर उठाया। रेस्टोरेंट से पैकेट लिया तो देखा—ऑर्डर छोटा था, बस एक सादा खिचड़ी, दही और दो केले। पता शहर के पुराने हिस्से का था। एक जर्जर-सी बिल्डिंग। ऊपर तीसरी मंज़िल। डोरबेल दबाई... दरवाज़ा एक बूढ़ी अम्मा ने खोला। सफेद बाल, काँपते हाथ, आँखों पर मोटा चश्मा। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आवाज़ में मिठास .... अम्मा बोली “बेटा, पैकेट अंदर रख दो…अब हाथ काँपते हैं।” वह खाना टेबल पर रखकर जैसे ही मुड़ा कि अम्मा ने पूछा— “दो मिनट बैठोगे क्या ? अकेले खाना अच्छा नहीं लगता।” डिलीवरी बॉय ने घड़ी देखी। शिफ्ट तो ख़त्म हो चुकी थी। थोड़ा थका हुआ भी था। लेकिन पता नहीं क्यों, उस...












