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कंटेंट की व्याख्या

कंटेंट की व्याख्या : •••••••••••••••••••• कंटेंट आख़िर है क्या...वह जो हम देख रहे या वह जो देखने के बाद उस के लिए महसूस कर रहे। क्योंकि चल रही परिस्थिति किस तरह का परिणाम देगी ये किसी को नहीं पता। इसलिए परिस्थिति को देखते और उसमें जीते अगर उसके बारे में कोई धारणा बनाते है तो वो content नहीं होगा। क्योंकि वो एक भ्रामक धारणा है हर क्षण जो अनुभव हम पाते हैं, वह content की ही अभिव्यक्ति है और जो अनुभव करता है, वही भी उसी content का हिस्सा हो जाता है। वह कोई अलग “मैं” नहीं, बल्कि कंटेंट का ही चलन है। यह चलन, यह गतिशीलता, निरंतर अपने आप को संशोधित करती रहती है। प्रत्येक प्रयास, हर सोच, हर प्रतिक्रिया किसी पुराने कंटेंट से जन्मी होती है, उसी को संदर्भित करती है, और उसी का विस्तार है। हम जब किसी को देखते हैं। क्या हम सच में उसे देख रहे हैं, या उस देखे जाने की आदत को ? क्या वही पुराना अनुभव जागृत होता है ? या कुछ नया ? जैसे कोई पाँच साल पहले हमें अपमानित करता है। और आज फिर मिल जाता है।  तो क्या पहले महसूस होता है। पुराना अनुभव, उसकी पुनरावृत्ति या वर्तमान परिदृश्य  ? ? और वह पुरानी यादे...

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