शर्म है ऐसे पुरुषत्व पर
शर्म है ऐसे पुरुषत्व पर: ••••••••••••••••••••• क्या इस तरह की कोई खबर पढ़कर आत्मा छलनी नहीं होती... इंसानियत तो अब लोगों में कम ही नज़र आती है। पर इतना वहशीपन कि उम्र का लिहाज़ भी उस सुख से छोटा है जिसकी तीव्र लालसा की गई है। 90 साल की बुजुर्ग महिला, जिसके ना तन में दम होगा ना ही मन में। 4 लोगों के जरिये गैंगरेप। क्या ही स्थिति हुई होगी उसकी कि 12 घण्टे तक दर्द से तड़पती रही वो। पर दरिंदों को दया नहीं आई। अमूमन रेप जैसी घटनाओं में विकृत मानसिकता का होना ही पाया जाता है। जिसमें इंसान अपनी वहशी लालच का वशीभूत हो जाता है। लेकिन फ़िर भी कहीं ना कहीं दिमाग तो इंसान के अंदर रहता है ना। तो क्या वो स्थिति, उम्र , स्थान आदि का भान खो बैठता है। जो भी बलात्कार जैसी घटना को अंजाम दे रहा वो इतना तो चैतन्य होता है कि उसे क्या करना है ये पता है। फिर बलात्कारी के मन में जुनून इस कदर कैसे हावी हो जाता है कि वह ये भी ना समझ सके कि जिस महिला या बच्ची के साथ वो बलात्कार कर रहा उसकी उम्र उसे वो सुख नहीं दे पाएगी जिसकी लालसा उसने की है । पुरुषत्व सृष्टि की देन तब तक है जब तक उसके सा...











